शनिवार, 23 जनवरी 2010

सच नंगा और झूठ सच्चा

एक बार सच और झूठ नदी में स्नान करने पहुंचे। दोनो ने अपने-अपने कपड़े उतार कर नदी के तट पर रख दिए और झट-पट नदी में कूद पड़े। सबसे पहले झूठ नहाकर नदी से बाहर आया और सच के कपड़े पहनकर चला गया। सच अभी भी नहा रहा था। जब वह स्नान कर बाहर निकला तो उसके कपड़े गायब थे। वहां तो झूठ के कपड़े पड़े थे। भला सच उसके कपड़े कैसे पहनता? कहते हैं तब से सच नंगा है और झूठ सच के कपड़े पहनकर सच के रूप में प्रतिष्ठित है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

रहस्यमय कछुवा

कई साल पहले अयोध्या नगरी में सरयू के किनारे जहां आज गुप्तार घाट है, के पूरे इलाक़े पर एक बहुत बड़े रईस ज़मींदार ठाकुर गंभीर सिंह की ज़मीन थी! नदी के किनारे-किनारे फलदार वृक्ष, रंग-बिरंगे फूलों से सुसज्जित बाग थे, जिनमें साल के बारह महीने फूल खिले रहते थे।

गुप्तार घाट से आधे किलो मीटर पर इनका महल था, जहां राजाओं जैसी शान-शौकत व भोग-विलास की सारी सामग्री मौजूद थी। इनके परिवार में इनकी पत्नी सरस्वती देवी, दो लड़के और एक लड़की थी. ज़मींदार साहब एक नेक और रहम दिल इंसान थे। उनके खेतों में बहुत सारे मजदूर काम करते थे और वे उनके सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते थे। उनकी सज्जनता और उदारता की पूरे इलाक़े में चर्चा थी। उनके यहां जो भी काम करते थे, वे अपने को धन्य समझते थे।

इनकी लड़की का नाम सुरबाला था। वह बहुत खूबसूरत लड़की थी, लंबे घने बाल, मृग जैसी आंखें, गोल चेहरा, चौड़ा चमकता माथा, चेहरे पर हर समय कुदरती मुस्कान ! सुरबाला जथो नाम तथो गुण वाली शांत स्वभाव और कोमल हृदय वाली, सर्वगुण संपन्न लड़की थी। उसको राजकुमारियों जैसे लिवास में सज-धज कर रहना पसंद था। मां-बाप की प्यारी लड़की थी, इसलिए जो वह चाहती थी एकदम हाजिर हो जाता था। उसके पास एक कीमती हार था, जिसको वह हर समय गले में डाल कर रखती थी।

ज़मींदार साहब ने सरयू के किनारे एक शानदार घाट बना रखा था, जहां केवल परिवार के लोग ही जा सकते थे। एक चबूतरा बना हुआ था, उसी पर बैठ कर ये लोग सरयू की बाढ़ देखा करते थे ! सुरबाला कभी-कभी अकेली घाट पर आ जाती थी ! बरसात के दिन थे, सुरबाला अकेली ही घाट पर आ कर सीढ़ियों पर बैठ कर अपना मुंह धो रही थी कि अचानक उसके गले से उसका कीमती हार निकल कर नदी की अपार जल राशि में समा गया। बेचारी बहुत रोई-चिल्लाई कि कोई आकर उसका हार पानी से निकल ले। लेकिन वहां कोई सुनने वाला नहीं था केवल कुछ पेड़ों पर बैठे हुए पक्षी के।

अचानक उसके कानों में कुछ मधुर शब्द गूंजने लगे, जो उसके नज़दीक से आ रहे थे ! उसने उन शब्दों को गौर से सुना, जैसे कोई कह रहा है सुरबाला रोओ मत, मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं, पर मेरी कुछ शर्तें हैं। सुरबाला ने इधर-उधर देखा, कोई इंसान तो नज़र नहीं आया। लेकिन एक भद्दा-सा कछुवा सीढ़ियों पर बैठा नज़र आया। सुरबाला ने उसकी तरफ देखकर कहा, 'कौन बोल रहा है?' कछुवा बोला, 'मैं बोल रहा हू !' लड़की को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ, कुछ देर बाद बोली, 'बताओ, तुम्हारी क्या शर्तें हैं। ' उसने कहा, 'तुम्हें रोज इसी वक्त मुझसे मिलने आना होगा, मुझसे दोस्ती करनी होगी। अगर मंजूर है, तो बोलो मैं अभी तुम्हारा हार इस गहरी नदी से निकल लाता हूं !' लड़की ने हां भर दी और कछुवे ने एक छलांग मार कर थोड़ी देर में ही हार लाकर सुरबाला की गोदी में डाल दिया।

शर्त के मुताबिक सुरबाला को न चाहते हुए भी उससे मिलना पड़ता था और उससे बात करनी पड़ती थी ! काफ़ी दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा ! कछुवा लड़की को मजेदार किस्से-कहानियां सुनाया करता था, पहले तो उसने उसके किस्से कहानियों पर ध्यान नहीं दिया ! लेकिन फिर उसे उन कहानियों में आनंद आने लगा।

एक दिन कछुवे ने डरते-डरते सुरबाला से पूछ लिया 'क्या तुम मुझसे शादी करोगी?' इस किस्म के घटिया प्रस्ताव पर सुरबाला को बड़ा गुस्सा आया, बोली, 'तुम एक भद्दा सा कछुवा, मैं एक सुंदर लड़की, मैं तुमसे कैसे शादी कर सकती हूं, ज़रा कहने से पहले थोड़ा सोच लिया होता!' अगले दिन भी कछुवे ने लड़की से वही सवाल किया और लड़की ने भी वैसे ही जवाब दिया ! यह सिलसिला करीब एक महीने तक चलता रहा।

आख़िर एक दिन लड़की ने यह सोच कर कि यह संभव तो नहीं है, ज़रा हां भर कर देखती हूं कि यह मुझसे कैसे शादी करता है और लड़की ने हां भर दी! उसके हां भरते ही एक ज़ोरदार आवाज़ हुई और वह स्थान जहां पर वे दोनों थे बैठे थे, बादलों से घिर गया! धीरे-धीरे धुएं का गुब्बार क़म हुआ! लड़की ने देखा कि जहां पर अभी कुछ देर पहले एक भद्दा-सा कछुवा बैठा था, वहां एक खूबसूरत, नवजवान राजकुमार मुस्कराते हुआ खड़ा है! लड़की बड़ी खुश हुई और इस रहस्य के बारे में उसने राजकुमार से पूछा! राजकुमार ने अपनी जिंदगी की पूरी कहानी उसको सुनाई कि वह भी एक राज्य का राजकुमार था।

एक दिन घूमते-घूमते इसी स्थान पर आकर इस दरिया में डुबकी लगाने लगा। यहां एक साधु बाबा रहते थे, उन्होंने मुझे यहां पर स्नान करने के ळिए मना किया। मैं उनसे उलझ गया और गुस्से में उनका अपमान कर बैठा। उन्होंने गुस्से में आकर मुझे कछुवा होने का श्राप दे दिया, बस उनके श्राप से मैं कछुवा बन गया। जब मैंने उनसे मुक्ति का मार्ग पूछा, तो उन्होंने मुझसे कहा था कि जिस दिन कोई खूबसूरत, सुशील, सर्वगुणसम्पन नौजवान लड़की तुमसे शादी करने को हां भर देगी, उसी वक्त तुम मेरे श्राप से मुक्त हो जाओगे! इस दिन के इंतजार में मुझे पूरे 50 साल लगे हैं। लड़की उस राजकुमार को अपने महल में ले गई और उसके माता-पिता ने खुशी-खुशी उन दोनो की शादी कर दी।

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

वृधो की जिंदगी की नई कहानी


उनकी नम आंखों में जब्त हैं दुनियादारी के रंजो-गम। अपनों से बिछोह की दास्तां बयां करते उनके लब लड़खड़ा उठते हैं। कलेजे में एक हूक के करवट लेते ही गैरतमंदी की दुआओं में ऊपर उठ जाते हैं उनके हाथ। उम्र के आखिरी मुकाम पर अपने तो दामन झटक गए थे; यह खैर है उन गैरों का-जिन्होंने लपककर हाथ थाम लिया। अब इसे आशियाना कह लीजिए या ठौर-ठिकाना। अब तो यही बसेरा है, और यही 'अपना घर'।

यह विधवा संध्या राय [68 वर्षीया] के दिल की बात है। उसके लिए यह आसरा किसी स्वर्ग से कम नहीं। अगर 'अपना घर' नहीं मिला होता तो संध्या इस दुनिया से कूच कर गई होती। आठ माह पहले भूख से हारकर वह उल्टा डांगा के प्लेटफार्म पर ट्रेन से कट मरने के लिए पहुंची थी। दानिशमंदों की मदद से उसे मिला 'अपना घर' का सहारा, जहां से शुरू हुई उसकी तन्हा बूढ़ी जिंदगी की नई कहानी।

नगर से तकरीबन पांच किमी पश्चिम यह जो 'अपना घर' [वृद्धाश्रम] है, कभी उसकी जिन्दगी में झांककर देखिए तो दुनियादारी के सौ रंग रक्स करते नजर आएंगे। यहां बसी है उन बुजुर्गो की दुनिया, जिनके लिए सहारे की कोई उम्मीद नहीं बची थी

वक्तमुखालिफ था, जिस्म कमजोर। अपने कन्नी काट गए थे, दुनिया मुंह मोड़ चुकी थी। जिन्दगी से टूटते आस की उस घड़ी में 'अपना घर' ने बांधा साथ का डोर। मुंह में भात-दाल का कौर भरे विकलांग कल्याण गांगुली [65 वर्ष] पूछने पर भावुक हो जाते हैं। कल्याण कहते हैं कि 'बाबू, आप ही लोग मेरे भगवान हैं, आप ही मालिक। आप देते हैं, हम खाते हैं। आपके सिवाय हमारा है कौन!'


72 वर्षीय बिन्देश्वर महतो को यहां सिलीगुड़ी अस्पताल से लाया गया था। अस्पताल में उन्हें छोड़कर अपने भाग निकले थे। बिन्देश्वर की हसरत बेटे से मिलने की है, लेकिन दु:ख यह कि वह पूछता नहीं। बिन्देश्वर कहते हैं- 'वह [बेटा] तो पहचानेगा भी नहीं, अब तो यहीं जिन्दगी है! हम जैसे भी हैं, खुश हैं।'

दरअसल, 'अपना घर' की पूरी व्यवस्था चन्दे की राशि और सेवा की भावना पर टिकी हुई है। एक असहाय दम्पति को आसरा देकर सुभाष जी कुम्भट ने इसकी नींव डाली थी। गुजरते वक्त के साथ आज यह 67 बुजुर्गो का आशियाना है। एक ट्रस्ट [महावीर इंटरनेशनल सेवा ट्रस्ट] है, जिसके सहारे चलती है व्यवस्था; एक प्रबंधन मंडल, जिसके कंधों पर है व्यवस्था का भार। ट्रस्टी कुछ आर्थिक योगदान करते हैं, और मिल जाता है कुछ दान-इससे सरकती है खर्चे की गाड़ी।

ट्रस्ट के सचिव संजय नाहटा कहते हैं कि सेवा के इस निस्वार्थ प्रयोजन के आड़े खर्च तो मामूली बात है, वैसे भी हमें संसाधनों की किल्लत नहीं। एक से एक दानवीर हैं, जिनकी बदौलत हम चिन्ताओं से निश्चिन्त हैं। नाहटा जी के बोल के बीच ही घंटी टनाटनाने लगती है। यह भोजन के वक्त की मुनादी है। अपनी थाली लिए बुजुर्ग डेरे से रसोईघर में पहुंच जाते हैं। सबको भोजन परोसा जाता है। खाने के बीच हंसी-ठिठोली भी चलती रहती है, काम के वक्तकहा-सुनी भी हो जाती है।

नल पर दो बुजुर्ग [एक महिला और एक पुरुष] अपनी थाली साफ करने के लिए पहुंचते हैं। पुरुष अंधा है, महिला की उम्र 70 के करीब। तनिक बक-झक के बाद वह महिला दोनों की थालियां खुद साफ कर देती है। यहां खड़े ट्रस्ट के सह सचिव पवन नकीपुरिया कहते हैं कि वृद्धाश्रम की जीवन्तता में यह प्रेमभाव रच-बस गया है। बुजुर्ग एक-दूसरे का बेहद ख्याल करते हैं। वे खुश होते हैं तो तुनकते भी हैं। कभी-कभार तो बीच-बचाव के लिए हमें हस्तक्षेप भी करना पड़ जाता है।

हमारी बातों के बीच में 65 वर्षीय रमा होर आ जाती है। वह कहती है, 'ना बाबा, हम नहीं लड़ते। हम तो परिवार की तरह रहते हैं।' यह रमा की सफाई है। वैसे भी रमा सफाई के काम में माहिर है। इसमें उसे मजा भी आता है। उसे निठल्ला बैठकर खाना पसंद नहीं करती। अलसुबह उठकर वह वृद्धाश्रम में झाड़ू-पोछा लगा देती है, और खुद भी समय से तैयार हो जाती है।

रमा की दिनचर्या में यह तब्दीली 'अपना घर' का श्रेय है। चाय बगान में बीमार पति के दम तोड़ने के बाद रमा को कोई सहारा देने वाला नहीं था। 'अपना घर' के आंगन में छांव पाकर रमा की मुरझाई जिंदगी फिर से हरा हो गई।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

न देने वाला मन

न देने वाला मन

एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।

अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी।

शरारती बंदर

शरारती बंदर



एक समय शहर से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर का निर्माण कैया जा रहा था। मंदिर में लकडी का काम बहुत थ इसलिए लकडी चीरने वाले बहुत से मजदूर काम पर लगे हुए थे। यहां-वहां लकडी के लठ्टे पडे हुए थे और लठ्टे व शहतीर चीरने का काम चल रहा था। सारे मजदूरों को दोपहर का भोजन करने के लिए शहर जाना पडता था, इसलिए दोपहर के समय एक घंटे तक वहां कोई नहीं होता था। एक दिन खाने का समय हुआ तो सारे मजदूर काम छोडकर चल दिए। एक लठ्टा आधा चिरा रह गया था। आधे चिरे लठ्टे में मजदूर लकडी का कीला फंसाकर चले गए। ऐसा करने से दोबारा आरी घुसाने में आसानी रहती हैं।


तभी वहां बंदरों का एक दल उछलता-कूदता आया। उनमें एक शरारती बंदर भी था, जो बिना मतलब चीजों से छेडछाड करता रहता था। पंगे लेना उसकी आदत थी। बंदरों के सरदार ने सबको वहां पडी चीजों से छेडछाड न करने का आदेश दिया। सारे बंदर पेडों की ओर चल दिए, पर वह शैतान बंदर सबकी नजर बचाकर पीछे रह गया और लगा अडंगेबाजी करने।


उसकी नजर अधचिरे लठ्टे पर पडी। बस, वह उसी पर पिल पडा और बीच मेंअडाए गए कीले को देखने लगा। फिर उसने पास पडी आरी को देखा। उसे उठाकर लकडी पर रगडने लगा। उससे किर्रर्र-किर्रर्र की आवाज निकलने लगी तो उसने गुस्से से आरी पटक दी। उन बंदरो की भाषा में किर्रर्र-किर्रर्र का अर्थ 'निखट्टू' था। वह दोबारा लठ्टे के बीच फंसे कीले को देखने लगा।


उसके दिमाग में कौतुहल होने लगा कि इस कीले को लठ्टे के बीच में से निकाल दिया जाए तो क्या होगा? अब वह कीले को पकडकर उसे बाहर निकालने के लिए जोर आजमाईश करने लगा। लठ्टे के बीच फंसाया गया कीला तो दो पाटों के बीच बहुत मजबूती से जकडा गया होता हैं, क्योंकि लठ्टे के दो पाट बहुत मजबूत स्प्रिंग वाले क्लिप की तरह उसे दबाए रहते हैं।


बंदर खूब जोर लगाकर उसे हिलाने की कोशिश करने लगा। कीला जोज्र लगाने पर हिलने व खिसकने लगा तो बंदर अपनी शक्ति पर खुश हो गया।


वह और जोर से खौं-खौं करता कीला सरकाने लगा। इस धींगामुश्ती के बीच बंदर की पूंछ दो पाटों के बीच आ गई थी, जिसका उसे पता ही नहीं लगा।


उसने उत्साहित होकर एक जोरदार झटका मारा और जैसे ही कीला बाहर खिंचा, लठ्टे के दो चिरे भाग फटाक से क्लिप की तरह जुड गए और बीच में फंस गई बंदर की पूंछ। बंदर चिल्ला उठा।


तभी मजदूर वहां लौटे। उन्हें देखते ही बंदर नी भागने के लिए जोर लगाया तो उसकी पूंछ टूट गई। वह चीखता हुआ टूटी पूंछ लेकर भागा।

राजा और सेवक

राजा और सेवक

एक नगर में किसी व्यापारी का नया घर बनाया जा रहा था. लकड़ी का काम करनेवाले कारीगरों ने वहां पर दो शिकंजे लगाये हुए थे जिनमें फंसाकर लकड़ी के तख्तों को चीरा जाता था. पास ही एक पेड़ पर कुछ बंदर खेल रहे थे. उनमें से एक बंदर को शरारत सूझी और वह शिकंजे में फंसे दो तख्तों के बीच में खड़ा होकर कूदने लगा. तख्तों के झूलने में उसे बड़ा मज़ा आ रहा था.

एक बार बंदर ने पूरी ताक़त से छलाँग लगाई. होना क्या था! दोनों तख्ते फटाक से उठे और बंदर उनके बीच में फंसकर दर्द के मारे बिलबिलाने लगा. उसके बाहर निकलने का कोई रास्ता न था. कुछ देर में उसने दम तोड़ दिया. उसके साथी भी उसकी कोई मदद नहीं कर सकते थे. इस प्रकार वह बंदर अपनी नासमझी में मारा गया.

“जो व्यक्ति दूसरों के काम में इस प्रकार अपनी टांग अड़ाता है उसका ऐसा ही अंजाम होता है, भाई. इसलिए मैं कहता हूँ कि शेर को भूल जाओ और अपने भोजन की चिंता करो. हम इस झंझट में क्यों पड़ें?” – करटक ने कहा.

दमनक उसकी बात सुनकर चिढ़कर बोला – “तो क्या हम केवल भोजनभट्ट ही बनकर रहें? यह तो ठीक बात नहीं है. अपने मित्रों का भला करने के लिए और शत्रुओं को परास्त करने के लिए ही तो बुद्धिमान लोग राजा का सहारा लेते हैं. अपना पेट कौन नहीं भर लेता? जिसके जीवित रहने से अन्य प्राणियों को भी लाभ होता हो उसी का जीवन श्रेष्ठ है. क्या पक्षी भी दूसरों के गिराए हुए टुकड़ो से अपना पेट नहीं भर लेते? जो प्राणी न अपने पर, न पराये पर, न बंधुओं पर, और न दुखी पर दया करता हो उसका जीना संसार में बेकार है.

अपनी माता के यौवन और स्वास्थ्य को हर लेने वाले उस पुत्र के उत्पन्न होने का क्या लाभ यदि वह शिखर पर सदैव लहराने वाले झंडे की भांति अपने वंश में अग्रणी न हो. तटों पर उगनेवाले घास के झुंड का होना सार्थक नहीं होता यदि कोई उसे पकड़ कर किनारे पर न आ लगे. भवबाधा में नीचे-ऊपर संचरण करनेवाले जीवों के संताप को हरने का प्रयास करने वाले कुछ ही भले पुरुष होते हैं.

मनुष्य चाहे कितना ही शक्तिशाली हो, पर यदि उसकी शक्ति प्रकट न हो तो सभी उसका अपमान करते हैं क्योंकि लकड़ी के अन्दर व्याप्त आग को तो सभी लाँघ सकते हैं लेकिन जब वह आग बाहर जल रही होती है तो उसके समीप जाने की हिम्मत कोई नहीं करता.”

करटक ने अपने भाई की बातों को बड़े ध्यानपूर्वक सुना और फिर बोला – यह सब तो ठीक है लेकिन हम लोग तो इस शेर के साम्राज्य में अप्रधान गौण हैं, फिर हमें इस सबसे कैसा प्रयोजन? शास्त्रों में कहा गया है:

राजा के समक्ष जो अप्रधान बिगड़े दिमाग वाला बिना पूछे ही कुछ कहता है उसकी न केवल अवहेलना होती है बल्कि वह अपमानित भी किया जाता है. इसीलिए अपनी बात वहीं कहनी चाहिए जहाँ कुछ फल की प्राप्ति हो क्योंकि ऐसी जगह अपनी बात रखने का प्रभाव वैसा ही होता है जैसा सफ़ेद वस्त्र पर रंग पड़ने का होता है.”

दमनक ने करटक की बात सुनकर कहा – “नहीं भाई, ऐसा नहीं कहो, क्योंकि अप्रधान व्यक्ति भी राजा की सेवा करने पर प्रधान बन जाते हैं, और जो प्रधान राजा की सेवा नहीं करते उनके अप्रधान बनते देर नहीं लगती. जो नौकर राजा के क्रोध को सहन कर लेते हैं और नाराज़ राजा को खुश करने में सफल हो जाते हैं उनकी पदवी बढ़ जाती है. विद्वानों, बुद्धिजीवियों, और बहादुरों का सम्मान राजा के सिवा और कोई नहीं कर सकता. वे मनुष्य जो अपनी उच्च जाति आदि के अभिमान में राजा के पास नहीं जाते उन्हें असफलता और निराशा ही हाथ लगती है. राजाओं का सहारा लेकर ही बुद्धिमान लोगों को उनका उचित स्थान व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. और फिर बुद्धिमान लोगों के लिए राजा को अपने वश में कर लेना कौन सा कठिन काम है?”

करटक ने कहा – “भाई तुम कहना क्या चाहते हो?”

दमनक बोला – “मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि आज हमारा स्वामी और उसका परिवार भयभीत है. ऐसे अवसर पर हमें उसके पास जाकर उसके भय का कारण जानना चाहिए, उसके बाद ही हमें संधि, विरोध, प्रहार, या अन्य किसी अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिए. किसी शक्तिशाली का सहारा लेना राजनीति का सबसे बड़ा दांव-पेंच है. हम इनमें से कोई भी दांव बाद में लगा सकते हैं.”

“लेकिन तुमने यह कैसे जाना कि हमारा स्वामी भयभीत है?” – करटक ने पूछा.

दमनक ने हंसते हुए कहा – “कही हुई बात को तो पशु-पक्षी भी भांप लेते हैं लेकिन बुद्धिमान वही हैं जो बिना कही गई बात को भी चेहरे के हावभाव और चालढाल से जान जाते हैं, जैसा कि मनु जी ने कहा है:

आकार, मुख की बनावट, इशारा, चालढाल, बोलचाल, आँखों की थिरकन आदि द्वारा मन के भीतर की बात जानी जा सकती है. इसीलिए मैंने यह सब जान लिया है. मैं निर्भय होकर शेर के पास जाऊँगा और उसकी पूरी सहायता करूंगा.”

“लेकिन तुम्हें तो अभी राजदरबार में जाना ही नहीं होता, भाई. ऐसे में तुम अपनी सेवा कैसे दोगे?” – करटक ने कहा.

दमनक ने मुस्कुराते हुए कहा – “क्यों? क्या मैं राजा की सेवा करना नहीं जानता? पिताजी की गोद में खेलते समय भी मैंने घर में आनेवाले साधुओं, सन्यासियों, और विद्वानों की जो बातें सुनी थीं वे मुझे अभी भी याद हैं. उनका सार इस प्रकार है, सुनो:
दमनक ने करटक से कहा:-

इस सुंदर धरती को शूरवीर, विद्वान, और सेवाभाव वाले मनुष्य ही खोज पाते हैं.

सेवा वही है जो स्वामी का हित करे. ऐसी सेवा का ही मूल्य होता है. इसलिए विद्वानों को चाहिए कि वे सेवा द्वारा ही राजा को प्रसन्न रखकर उसका सहारा लें, किसी दूसरे प्रकार से नहीं.

पंडित को चाहिए कि वह अपने गुणों को न जानने वाले की सेवा न करे. जिस प्रकार बंजर धरती पर हल जोतने और बीज बोने का कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार मंद बुद्धि वाले प्राणी से विद्या और गुण की बात करना बेकार होता है.

निर्धन और निम्न वर्ग के लोग यदि गुणवान हों तो उनकी सेवा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि जीवन में ऐसा समय कभी-न-कभी आ ही जाता है जब ऐसे लोग काम आ जाते हैं.

भले ही मनुष्य को भूखा-प्यासा रहना पड़े लेकिन विचारहीन धनवान से कभी भी सहायता नहीं मांगनी चाहिए.

जिसका सहारा लेने पर भूखा नौकर अपना पेट नहीं भर सके ऐसे राजा का आश्रय त्याग देना चाहिए.

राजमाता, राजकुमार, मुख्यमंत्री, और राजपाल से भी राजा के समान बर्ताव करना चाहिए. अपने कर्तव्य का पालन करने वाला सेवक राजा को सदैव प्रिय होता है.

अपने स्वामी के द्वारा धन की प्राप्ति होने पर जो सेवक प्रसन्न होता है और अपने स्वामी का धन्यवाद करता है, ऐसा सेवक अपने स्वामी की दृष्टि में आदर्श और गुणवान माना जाता है.

जो वीर युद्धभूमि में आगे-आगे, नगरी में पीछे-पीछे, और राजमहल में द्वार पर खड़ा रहता है वही राजा को अच्छा लगता है.

जो सेवक जुआ को अपराध, मदिरा को विष, और पराई स्त्री को व्यर्थ जानता है वह राजा को अत्यंत प्रिय होता है.

जो सेवक यह जानता है कि राजा उसे अच्छा मानते हैं और उसकी बात मानते हैं, फिर भी वह विधि और नियमों का उल्लंधन नहीं करता वही बुद्धिमान होता है.

जो सेवक अपने राजा की अनुचित बात का बुरा नहीं मानता, उसके लिए निडर होकर लड़ाई करता है, और परदेस को भी अपना देश मानता है वह राजा को सदैव अच्छा लगता है.”

करटक ने यह सब सुनकर हंसते हुए पूछा – “वाह भाई. ये सारी बातें तो बहुत अच्छी हैं. अब तुम यह बताओ कि हम शेर के पास जाकर उससे क्या बात करेंगे?”

“सारी बातें बातों से ही निकलती हैं भाई, जिस प्रकार अच्छी वर्षा होने पर एक बीज से दूसरा बीज पैदा हो जाता है. किसी के मन में पाप होता है पर उसकी वाणी मधुर होती है, किसी की बोली कड़वी होती है पर मन स्वच्छ होता है, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी बातें भी अच्छी होती हैं और मन भी साफ़ होता है. इसलिए मैं वहां कोई ऐसी बात नहीं करूंगा जिसका कोई बुरा प्रभाव पड़े.” – दमनक ने कहा.

कुछ पल सोच में डूबे रहने के बाद करटक ने कहा – “भाई, राजा लोग बड़ी मुश्किल से वश में आते हैं क्योंकि वे सदा ही चापलूस और धूर्त लोगों से घिरे होते हैं जो उसे नीचे वालों से मिलने नहीं देते. इस प्रकार राजाओं से मिलना सदैव कठिन होता है.”

“हाँ भैया. मुझे यह पता है और मैं यह भी जानता हूँ कि मनुष्य अपनी तीव्र बुद्धि से सभी को जीत सकता है और अपना मार्ग आप ही बना सकता है. बुद्धिमान व्यक्ति जब राजा तक पहुँच जाते हैं तब धूर्त और चापलूस लोग राजा की नज़रों से नीचे गिर जाते हैं. इस रहस्य का पता बड़ी कठिनाई से ही चल पाता है.” – दमनक ने कहा.

“भाई, जो जैसा करता है वह वैसा ही भरता है. बुद्धिमान पुरुष अपना स्थान स्वयं बनाते हैं. अच्छे सेवक का आचरण यही है कि वह अपने स्वामी की हर आज्ञा का पालन करे. मीठी बोली से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं. राजा के क्रोधित होनेपर प्यार से उसका दिल जीतने का प्रयास करना चाहिए. उसकी पसंद की वस्तुओं से भी प्रेम दर्शाना चाहिए. ऐसा करने पर बुद्धिमान व्यक्ति को किसी का मन जीतने के लिए कोई तंत्र-मंत्र नहीं करना पड़ता.”

करटक ने अपनी हार मानते हुए कहा – “ठीक है भाई. यदि यही तुम्हारे विचार हैं तो तुम वही करो जो तुमने सोचा है.”

दमनक मुस्कुराते हुए शेर की ओर चल दिया.

शेर ने जब दमनक को अपने पास आते देखा तो अपने मंत्री से कहा – “देखो, हमारे पुराने मंत्री का पुत्र यहाँ आ रहा है. उसे आदर सहित मेरे पास ले आओ.”

शेर के समक्ष पहुँचने पर दमनक ने अपना सर झुककर प्रणाम किया. शेर अपने पुराने मंत्री के पुत्र को कई दिनों बाद देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपने पास बिठाकर प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरकर बोला – “कैसे हो दमनक? तुमने तो इधर आना बंद ही कर दिया था. क्या तुम मुझे भूल गए थे?”

दमनक बहुत आदरपूर्वक बोला – “महाराज, आप भले ही मुझे भूल जाएँ पर मैं आपको कैसे भूल सकता हूं? मैं तो आपके सबसे सबसे पुराने और वफादार मंत्री का पुत्र हूं. आज जब मैंने आपको किसी समस्या से ग्रसित देखा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैं आपके पास चला आया. कठिनाइयों के समय ही तो मनुष्य को अपने और पराये की पहचान होती है. आपके संकट के क्षणों में आपके समीप रहना ही मेरा कर्त्तव्य है. महाराज, आप तो जानते ही हैं कि:-

“जब कोई राजा अपने सेवक के गुणों की कद्र नहीं करता तो सेवक उसका साथ नहीं देते. ऐसे में जब राजा अपने बुद्धिमान सेवक को अपने सानिध्य से वंचित कर देता है तो सेवक में उसके प्रति वैमनस्य आ जाता है. इसमें सेवक का कोई दोष नहीं होता, जिस प्रकार सोने के गहनों में जड़ा जाने वाला हीरा जब पीतल के गहने में जड़ दिया जाता है तो न तो वह हीरा लगता है और न ही कोई शोभा देता है. हीरे की पहचान करने वाले पारखी भी ऐसे में उसे जड़ने वाले से घृणा करने लगते हैं.”

“आपने मुझसे पूछा कि मैं इतने दिनों बाद यहाँ क्यों आया हूँ तो इसका उत्तर यही है कि जिस मार्ग में दायें और बाएं में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता हो वहां बुद्धिमान पुरुष कैसे रुक सकते हैं?”

” जिस देश में जौहरी न हों वहां सागर से निकले मोतियों का मोल कौन आँक सकता है.”

“जिसकी बुद्धि कांच को मणि और मणि को कांच समझती हो उसके पास कोई नौकर नहीं ठहरते.”

“जिस घर में मालिक सभी नौकरों से उनकी योग्यता और अयोग्यता आदि का विचार न करके एक समान बर्ताव करता है वहां बुद्धिमान सेवकों के ह्रदय भग्न हो जाते हैं.”

“सेवकों के बिना राजा नहीं रह सकते और राजा के बिना सेवक नहीं रह सकते, ये दोनों एक दूसरे से जुड़े रहते हैं.”

“जो राजा अपनी प्रजा का मन न जीत सके, जनहित के कार्य न करे, उसे कान्तिविहीन सूर्य ही कहा जा सकता है.”

“खुश होनेपर राजा अपने जिन बहादुर और वफादार सेवकों को ईनाम देता है वही सेवक समय आने पर राजा के लिए अपनी जान भी न्यौछावर कर देते हैं.”

“जो नौकर भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि से नहीं घबराता वही वफादार हो सकता है.”

शेर पिंगलक ने दमनक की ज्ञान भरी ऐसी बातें बहुत उत्सुकता से सुनीं और फिर कहा – “तुम क्या कहना चाहते हो, पुत्र?”

दमनक ने कहा – “आपके हित के निमित्त मैं एक गुप्त बात पर चर्चा करना चाहता हूँ पर डरता हूँ कहीं आप क्रोधित न हो जाएँ.”

शेर पिंगलक ने कहा – “तुम मेरे भूतपूर्व मंत्री के पुत्र हो और बुद्धिमान भी हो. मुझे तुम्हारी योग्यता का ज्ञान है. जो कुछ भी कहना चाहते हो निस्संकोच होकर कहो.”

दमनक ने कहा – “महाराज, राजा के हित या अहित से जुड़ी बात सबके सामने नहीं बल्कि गुप्त में कहनी चाहिए क्योंकि छः कानों में जाने के बाद गुप्त बात मुसीबत का कारण बन सकती है.”

पिंगलक ने दमनक की बात पर दो पल के लिए विचार किया और उसे यह उचित जान पड़ी. अपनी आँख के इशारे से उसने वहां बैठे अन्य जानवरों को जाने को कहा. जब सारे जानवर वहां से चले गए तब दमनक ने पिंगलक की और देखकर कहा – “महाराज, मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज सुबह जब आप नदी पर पानी पीने गए थे तब बिना पिए ही वापस क्यों लौट आये?”

पिंगलक ने हंसकर कहा – “अरे, वह तो वैसे ही बस…”

दमनक बोला – “महाराज, इस बात को छुपाइये नहीं. यदि यह कही नहीं जा सकती हो तो कृपया रहने दें परन्तु इस विषय में कहा गया है कि पत्नी से, मित्रों से, और बच्चों से किसी गुप्त विचार को थोड़ा-बहुत छुपा लेना चाहिए लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि अपने सेवकों और स्वामी के अनुरोध पर गुप्त से गुप्त बात को भी समय आने पर कह डालें.”

दमनक की बात सुनकर पिंगलक सोच में पड़ गया क्योंकि उसे दमनक की बातें सच्चे मित्र की बातों जैसी सत्य प्रतीत हो रही थी. मित्रों के बारे में कहा गया है कि सच्चे मित्र, वफादार सेवक, बुद्धिमान स्त्री, और कोमल ह्रदय मालिक के आगे अपना रोना रोकर आदमी अपने दिल का बोझ हल्का कर लेता है. इसीलिए पिंगलक ने अपने दिल की बात अपने होठों पर लाते हुए कहा – “मित्र, मैं इस जंगल से जाना चाहता हूँ.”

“क्यों महाराज? इस जंगल के स्वामी होने पर भी आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं?” – दमनक ने पूछा.

“मित्र, मैं तुमसे क्या छुपाऊँ… वास्तव में इस जंगल में एक अद्भुत जंतु आ गया है जिसकी गर्जना ही इतनी भयंकर है कि डर के मारे कलेजा मुंह को आ जाता है. सोचो, ऐसे जंतु में कितनी शक्ति होगी!” – पिंगलक ने कहा.

दमनक ने हंसकर शेर की और देखा और बड़े विनोदी स्वर में बोला – “महाराज, यह तो ठीक नहीं है कि आप उस जंतु की गर्जना से ही भयभीत हो गए! कहा गया है – जल के वेग से बाँध टूट जाता है, सावधान न रहने पर गुप्त विचार प्रकट हो जाता है, चुगली करने पर प्रेम टूट जाता है, और कठोर वचनों से आहत होकर प्रियजन दूर हो जाते हैं. अपने पूर्वजों के इस वन को छोड़ना आपके हित में नहीं होगा. अत्यंत उग्र और भयंकर शत्रु से सामना होनेपर भी जिसका धीरज नहीं छूटता वह राजा कभी हार का मुख नहीं देखता.

गर्मी के दिनों में तालाब तो सारे ही सूख जाते हैं लेकिन सागर कभी नहीं सूखता. जो व्यक्ति मुसीबतों से नहीं डरता, सुख में प्रसन्न नहीं रहता, और युद्ध करने से नहीं कतराता, ऐसा वीर पुरुष हर माँ के गर्भ से उत्पन्न नहीं होता है.

शक्तिशाली नहीं होने पर नम्रता का व्यवहार करना और स्वयं में गरुता नहीं होना, ऐसे लक्षण वीर पुरुषों के नहीं बल्कि तिनके के होते हैं. सुन्दर होते हुए भी लाख के गहने बेकार के ही होते हैं – ऐसी बातें सोचकर राजा को धैर्य रखना चाहिए. इस प्रकार डरकर जंगल से भागने में तो आपकी बड़ी बदनामी होगी. आपकी तरह मैं भी पहले यही समझा था कि वह कोई भयंकर जीव है पर जब गौर से देखा तो पाया कि वह तो ढोल में पोल ही है.”

पिंगलक ने पूछा – “तुम कहना क्या चाहते हो, दमनक?”

दमनक ने उसे कहानी सुनाना प्रारंभ किया.
एक बार एक गीदड़ उस जगह चला गया जहां दो सेनाएं युद्ध कर रही थीं. एक छोटी सी पहाड़ी पर एक नगाड़ा रखा हुआ था. हवा के एक तेज झोंके से नगाड़ा लुढ़क गया और जंगल में पहुंच गया.

गीदड़ भी नगाड़े के पीछे-पीछे चला गया. वह बेचारा कई दिनों से भूखा था. उसे लगा कि नगाड़े के भीतर कुछ खाना रखा हुआ है.

जंगल में आसपास लगे पेड़ों और झाड़ियों की टहनियां नगाड़े से टकराने लगीं और उसमें से आवाज़ें आने लगीं.

गीदड़ इन आवाजों को सुनकर डर गया और सोचने लगा – “यह सब क्या है? यहां से भाग जाना चाहिए. नहीं, नहीं. मैं अपने पूर्वजों के जंगल को इस तरह छोड़कर नहीं जा सकता. इस आवाज़ को रहस्य का पता लगाना ही होगा.”

यह सोचकर वह उस नगाड़े का पास पहुंच गया. कुछ देर तक उसे देखने के बाद वह सोचने लगा कि यह जीव तो बहुत बड़ा है, शक्तिशाली भी प्रतीत होता है. इसका पेट बहुत बड़ा है. इसे चीरकर खाने में तो कई दिनों के लिए चर्बी और मांस खाने को मिल जायेगा.

बस, यही सोचकर गीदड़ ने उस नगाडे का चमड़ा फाड़ दिया. यह करने में उसके होंठ छिल गए और दांतों से खून आने लगा. चंदे को फाड़ते ही गीदड़ ढोल में जा गिरा. वहां क्या था? ढोल में पोल.

वहां कुछ भी न पाकर गीदड़ को बहुत निराशा हुई. कहाँ तो वह इस नगाडे से डर रहा था और कहाँ उसे इसमें कुछ भी न मिला. वह स्वयं से कहने लगा – “सिर्फ आवाज़ सुनकर ही भयभीत नहीं हो जाना चाहिए. मनुष्य को कभी भी कायर नहीं बनना चाहिए.”

पिंगलक ने यह सुनकर दमनक से कहा – “देखो पुत्र, मेरे साथी और मेरा परिवार इस समय बहुत भयभीत है. ये सभी यहाँ से चले जाना चाहते हैं. अब तुम्हीं बताओ अब मैं क्या करूँ?”

दमनक ने कहा – “इसमें इनका कोई दोष नहीं है महाराज. आप तो जानते ही होंगे, ‘जैसा राजा, वैसी प्रजा’. घोड़ा, शास्त्र, वीणा, नर, और नारी, ये सभी विशेष पुरुष को पाकर ही योग्य अथवा अयोग्य होते हैं. इसलिए आप यहाँ से कहीं नहीं जाएँ जब तक मैं वास्तविकता का पता लगाकर वापस न आ जाऊं.”

पिंगलक ने दमनक से पूछा – “क्या तुम वाकई वहां जाना चाहते हो?”

“जी महाराज, अच्छे और वफादार दास का कर्त्तव्य मुझे पूरा करना ही होगा. बड़े लोग कह गए हैं कि अपने मालिक का कहना मानने में झिझकना नहीं चाहिए चाहे इसके लिए सांप के मुंह में या सागर की गहराई में ही क्यों न जाना पड़ जाए. अपने मालिक के आदेश को सुनकर जो सेवक यह नहीं सोचता कि ‘यह सरल है या कठिन’, वही महान होता है.” – दमनक ने कहा.

दमनक की इन बातों को सुनकर पिंगलक बहुत खुश हो गया. उसने दमनक की पीठ थपथपाते हुए कहा – “ठीक है. यदि यही बात है तो तुम जाओ. भगवान तुम्हें इस काम में सफलता दे.”

“धन्यवाद, स्वामी. ईश्वर ने चाहा तो मैं सफल होकर ही लौटूंगा.” – यह कहकर दमनक उस ओर चल दिया जहां से बैल संजीवक के हुंकारने की आवाज़ आ रही थी.

दमनक के चले जाने के बाद पिंगलक सोचने लगा – “यह मैंने अच्छा नहीं किया जो उसे अपने सारे भेद बता दिए. कहीं यह शत्रु का जासूस न हो, या दोनों पक्षों को पटाकर अपना स्वार्थ न सिद्ध कर रहा हो. यह भी हो सकता है कि यह मुझसे पुराना बदला चुकाना चाहता हो क्योंकि मैंने इसके पिता को मंत्रीपद से हटा दिया था. इस बारे में कहा गया है कि -

जो लोग राजा के यहां पहले से ही ऊंचे पद पर होते हुए बड़ा मान पाते हैं, यदि उन्हें अपने पद से हटा दिया जाए तो वे अच्छे होते हुए भी उस राजा के शत्रु बन जाते हैं. वे अपने अपमान का बदला लेना चाहते हैं. मुझे भी दमनक को परखने के लिए किसी दूसरे स्थान पर रहना शुरू कर देना चाहिए. यह भी हो सकता है कि दमनक उस जीव के साथ मिलकर मुझे मरवा डाले. ऐसे ही लोगों के बारे में कहा गया है कि -

दूसरे पर विश्वास न करने वाले कमज़ोर प्राणी बलवानों से नहीं मारे जाते, जबकि कभी-कभी बलवान भी विश्वास करने पर कमज़ोर के हाथों मारा जाता है.

कसमें खाकर संधि करने वाले शत्रु का भी विश्वास नहीं करना चाहिए. राज्य प्राप्त करने के लिए उद्यत वृत्तासुर इसी कारण से इंद्र के द्वारा मारा गया था.

देवताओं का शत्रु भी बिना विश्वास दिलाए बस में नहीं आता, इसी विश्वास के धोखे में तो इंद्र ने दिति के गर्भ को नष्ट कर दिया था.

यही सब सोचकर पिंगलक किसी दूसरे स्थान पर चला गया और दमनक के वापसी के मार्ग को देखते हुए प्रतीक्षा करने लगा.

शेषनाग की अंगूठी

शेषनाग की अंगूठी

सुदर्शन नाम का महाजन मैसूर में व्यापार करता था। उसके दो लड़के थे। बड़े का नाम माधो और छोटे का साधो था। सुदर्शन का ध्येय केवल धन बढ़ाना था। वह अपने पुत्रों को रुपये देकर बाहर भेजता और थोड़े ही दिनों में रुपये को दूना कर लाने के लिए कहता।
माधो जुआड़ी निकल गया। हां, साधो सीधा था। सुदर्शन ने दोनों बेटों को एक-एक हजार रुपये देकर व्यापार के लिए बाहर भेजा। माधो जुए में एक-दो दिनों में ही दो हजार रुपये जीतकर पिता को दे गया।
साधो जुआ खेलना पाप समझता था। वह जानता था कि जुए से कमाया हुआ धन अंत में दु:ख देता है। राजा युधिष्ठिर और राजा नल का सर्वस्व-नाश उसकी आंखों के सामने नाच रहा था। उसको रास्ते में एक वृद्धा स्त्री मिली। वह कोई देवी थी। उसके पास एक बड़ा ही सुंदर सांप था। साधो ने एक हजार में वही सांप खरीद लिया।
साधो जब घर लौटा तब उसका पिता सुदर्शन सांप को देखते ही क्रोध से आग-बबूला हो गया। उसने सांप के साथ साधो का घर से निकाल दिया।
साधो की दीन दशा देखकर सांप ने कहा - 'यदि तुम मुझे मेरी मां के पास पहुंचा दो तो मैं तुम्हें 'शेषनाग की अंगूठी' दिलवा दूंगा, जिससे तुम्हें सदा सुख मिलेगा।' साधो राजी हो गया। उसने सांप को उसकी माता के पास पहुंचा दिया। सर्पराज की मां ने बहुत प्रसन्न होकर साधो को 'शेषनाग की अंगूठी' दी और कहा - इस अंगूठी में यह गुण है कि इससे जो कुछ मांगा जाएगा वही मिलेगा। गाय के दूध से सवा बित्ता भूमि लीप कर, एक चौकी पर अंगूठी रख दे और जो मांगना हो, मांगे।
संयोग की बात, उसी समय एक राजा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसके दिए हुए मानचित्र के अनुसार पंद्रह दिनों में किला बना देगा उससे वह अपनी इकलौती बेटी का ब्याह करके उसे सारा राज्य दे देगा। राजा के कोई पुत्र न था।
यह सुनकर साधो बहुत प्रसन्न हुआ। उसने राजा के पास पहुंच कर किला बनवाने का जिम्मा लिया। बस, उसने 'शेषनाग की अंगूठी' की परीक्षा ली। ईश्वर की लीला ऐसी विचित्र कि परीक्षा सफल हुई और सचमुच किला शीघ्र तैयार हो गया। राजा ने प्रतिज्ञानुसार साधो से अपनी राजकुमारी का ब्याह कर दिया और राज्य भी दे दिया।
उधर सुदर्शन के मर जाने पर माधो ने सारी सम्पत्ति जुए में उड़ा डाली। जिस रास्ते से लक्ष्मी आई थी उसी रास्ते से चली गई। माधो भूखों मर रहा था। जब साधो को यह समाचार मिल गया तब उसने बड़े भाई को परिवार सहित बुलवा लिया और अपने राजमहल के पास ही एक सुंदर मकान में आराम से रखा।
जो पाप से बचता है उसके लिए सांप भी हीरे का अनमोल हार बन जाता है।